Saturday, April 16, 2011

अन्ना हजारे की मुहिम अंजाम तक पहुंच पाएगी ?


            गांधीवादी अन्ना हजारे देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के नए नायक बनकर उभरे हैं। उन्होंने 96 घंटों के आमरण अनशन में ही केन्द्र सरकार को बैकफुट पर ला खड़ा किया। सरकार ने लोकपाल विधेयक बनाने के लिए अन्ना की शर्तो को मान लिया है। केन्द्र ने वित्त मंत्री की अध्यक्षता वाली एक कमेटी गठित करके उसे नोटिफाई कर दिया है। जिसमें पांच सरकार और पांच ही सिविल सोसाएटी के नुमाइंदे शामिल हैं। यह कमेटी लोकपाल बिल के मसौदे का ब्लूप्रिंट तैयार करेगी। जिसे मनमोहन सिंह सरकार कैबिनेट के सामने रखने के बाद आगामी मानसून सत्र में बिल को लोकसभा में लाऐगी।
           यह मुहिम उस वक्त परवान चढ़ी जब पूरा देश विश्व कप क्रिकेट में मिली जीत की खुमारी में डूबा हुआ था। अन्ना ने दिल्ली के जंतर मंतर पर आमरण अनशन शुरू कर दिया। देखते ही देखते देश का हर तबका उनके पीछे खड़ा होता नजर आया। गौरतलब है कि पिछले 42 सालों के दौरान किसी भी सरकार ने लोकपाल बिल पास कराने की ईमानदार कोशिश नहीं की। लेकिन अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का शंखनाद करके देश में नए सिरे से उम्मीदें जगाई हैं। अगर संसद में कमेटी द्वारा तैयार किया गया बिल पास हो गया तो वो दिन दूर नहीं जब भ्रष्ट जन प्रतिनिधियों पर कानून का शिकंजा कसता दिखेगा।
             सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे 21 वी शताब्दी के भारत में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम छेड़ने वाले पहले व्यक्ति हैं। उनके पहले 1977 में जय प्रकाश नारायण और 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करके केन्द्र सरकारों को हिला चुके हैं। वीपी के 1987 में शुरू हुए आंदोलन को खड़ा करने में तो मीडिया की बड़ी भूमिका रही। लेकिन उनके पूर्ववर्ती आपातकाल के दौर में जेपी का आंदोलन बेहद महत्वपूर्ण था। उन्होंने इन्दिरा गांधी के खिलाफ पटना में आवाज उठाई और देखते ही देखते पूरा देश उनके पीछे खड़ा हो गया था। ठीक उसी तरह आज अन्ना के आंदोलन में जेपी की झलक नजर आती है।
            मौजूदा दौर में मीडिया आंदोलनों की पटकथा तैयार करता रहा है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं था। अन्ना हजारे ने लोकपाल बिल की मांग उठाकर दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद की। भारतीय मीडिया खुद-ब-खुद अन्ना की मुहिम के पीछे खड़ा हो गया। क्रिकेट का तमाशा, भूत प्रेत और नाग नागिन दिखाने में महारथ हासिल कर चुके इलेक्ट्रानिक मीडिया में अन्ना की हर बात और अंदाज ब्रेकिंग खबर था। जिसका नतीजा यह था कि देखते ही देखते देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत खड़ा हो गया। ऐसे में केन्द्र की यूपीए सरकार ने अन्ना हजारे के सुर में ही अपना सुर मिलाना बेहतर समझा।
              गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान देश एवं विभिन्न राज्यों में कई घोटाले उजागर हुए। मसलन, टूजी स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसायटी, कामनवेल्थ गेम्स, कर्नाटक में भूमि घोटाला, उत्तराखण्ड में स्टर्डिया भूमि मामला और जल विद्युत परियोजना आबंटन घोटाला वगैरह वगैरह। केन्द्र में रही किसी भी सरकार ने पिछले 42 सालों में लोकपाल बिल को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ हुंकार भरने में तत्परता दिखाई। एक के बाद एक सामने आ रहे घोटालों से त्रस्त देश के करोड़ों लोगों को उनमें एक नई उम्मीदें नजर आई।
              लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या जन लोकपाल बिल बन जाने मात्र से भ्रष्टाचार का सफाया हो जाऐगा? देश के कमोबेश डेढ़ दर्जन राज्यों में लोकायुक्त  नियुक्त हैं तो क्या उन राज्यों से भ्रष्टाचार का सफाया हो गया है? क्या लोकपाल बिल कमेटी मे शामिल हुए सिविल सोसाएटी के पांच देश के 121 करोड़ लोगों की वास्तविक नुमाइंदगी करते हैं? अन्ना हजारे की नीयत पर तो किसी को शक नहीं है, लेकिन क्या अन्य इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं? क्या शांति भूषण और प्रशांत भूषण यह दावा करने की स्थिति में हैं कि उन्होंने कभी भी बतौर वकील किसी गलत आदमी या मुद्दे की पैरवी नहीं की? मैं किसी पर भी सवालिया निशान नहीं खड़े कर रहा हूं। लेकिन समाज के विभिन्न तबकों की बीच यह सवाल उठ रहे हैं।
             बाबा रामदेव पहले ही लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी पर वंशवाद का अरोप लगा चुके हैं। ये बात और है कि बाद में उन्होंने अपने बयान को बदल दिया। गौरतलब है कि खुद रामदेव भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के अलम्बरदार रहे हैं। बाबा अपने योगा कैम्प में बड़े जोर-शोर से काले धन और भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते रहे हैं। अब ये बात और है कि वह उतनी गंभीरता नहीं दिखा पाए जितनी कि अन्ना हजारे ने दिखाई। बाबा रामदेव की गंभीरता का अंदाज इसी से हो जाता है कि वह कभी कहते हैं कि अलाने मंत्री ने मुझसे रिश्वत मांगी तो कभी फलाने ने। महत्वाकांक्षी रामदेव हवा में तीर छोड़ते हैं और फिर शांत हो जाते हैं।
             लेकिन अन्ना की हालिया मुहिम के मायने अलग हैं। उनका सार्वजानिक जीवन बेदाग और संघर्षशील रहा है। यही वजह है कि देश का जनमानस क्रिकेट की खुमारी से बाहर निकलकर उनके पीछे खड़ा हो गया। इस मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था के सभी अंगों को सामूहिक तौर पर काम करना होगा। ये सोलह आने सच है कि सियासतदानों ने देश में भ्रष्टाचार के बीज डालकर उसे व्यवस्था में पनपाया है। लेकिन व्यवस्था में विधायिका की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लिहाजा उससे जुड़े लोगों को सिरे से चोर साबित करने बजाय उनको जनता के प्रति जबाबदेह और पारदर्शी बनने के लिए बाध्य किए जाने की जरूरत है। सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप करने और जन लोकपाल बिल बन जाने मात्र से ही भ्रष्टाचार का खात्मा होने वाला नहीं है।
           इसमें कोई शक नहीं है कि अन्ना हजारे ने महात्मा गांधी की सोच को साकार करने की दिशा में एक भागीरथ प्रयास किया है। अब व्यवस्था के सभी अंगों को भ्रष्टाचार मिटाने के लिए गंभीरता से ईमानदार प्रयास करने चाहिए। खासतौर पर अन्ना के पीछे खड़े लोगों को अब ज्यादा सूझबूझ का परिचय देना होगा। नेताओं को ही सिरे से चारे साबित करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है, क्योंकि एनजीओ और उनसे जुड़े लोगों पर सवाल उठते रहे हैं। वैसे भी सिर्फ भाषणबाजी और नारेबाजी करके या फिर मोमबत्ती लेकर खड़े हो जाने भर से यह बीमारी खत्म होने वाली नहीं है। उम्मीद करनी चाहिए कि अन्ना हजारे की ताजा मुहिम अपने सही अंजाम तक पहुंचेगी।
 राहुल सिंह शेखावत

Thursday, February 10, 2011

वह विधवा थी या फिर सुहागिन



      मैं इस सवाल का जबाब बीती 18 जनवारी से ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। दरअसल, उस रोज मैं अपने एक पत्रकार साथी जगदीश जोशी के साथ नैनीताल शहर के डांठ पर खड़ा था। लोगों की भीड़ को देखकर मुझे कहानी समझ में आ गई थी। उसी बीच मेरी नज़रों के सामने से एक नहीं बल्कि दो अर्थियां एक साथ गुजर गई। मैनें वहां खड़े एक पुलिसकर्मी से पूछा कि एक साथ जाने वाले दो लोगों कौन थे
      उसने जबाब दिया कि डी जी सी साहब और उनकी पत्नी। दरअसल जिला शासकीय अधिवक्ता रवि साह की कार पिथौरागढ़ जिले में खाई में गिर गई थी। उस वक्त उनकी धर्मपत्नी मीना साह भी उनके साथ थी। रवि साह की मौत तो मौके पर ही हो गई थी, लेकिन  उनकी पत्नी की कुछ सांसे बाकी थी। उन्हें पिथौरागढ़ के अस्पताल में भरती जरूर कराया गया लेकिन जिन्दगी की जंग जीत नहीं पाई।
      राम नाम सत्य है कि गूंज के बीच देखते ही देखते अधिवक्ता दम्पत्ति की अन्तिम यात्रा आंखों के सामने से ओझल हो गई। इससे पहले कि मैं अपने साथ मौजूद पत्रकार साथी से कुछ कहता। उन्होंने कहा कि यार शेखावत जी दोनों खुशनसीब थें। भगवान ने गजब का न्याय किया है। चन्द दिनों पहले ही दोनों अपनी बिटियां की शादी करके पारिवारिक जिम्मेदारी से मुक्त हुए थे। और अब  पारिवारिक जिम्मेदारी से भी मुक्त हुए थे।
     लेकिन, मैंने अनायास जगदीश जोशी जी से कहा। महाराज, खुशनसीब किसे कह रहे हो। जोशी जी बोले कि दोनों ही एक साथ भगवान को प्यारे हुए हैं। मैंने उनसे फिर एक सवाल किया। क्या रवि साह जी की पित्न भी उनके जैसी भाग्यवान हैं। जोशी जी ने पहले तो मेरे चौखटे को शान्त होकर गौर से देखा और फिर हल्का सा मुस्कराए।
      मैंने कहा कि आपका समाज तो पति की मौत पहले होने वाली महिला को विधवा कहता है। भले ही साह दम्पत्ति एक साथ कार दुघZटना का शिकार हुए। लेकिन पत्नी ने तो बाद में दम तोड़ा था। आप मीना साह को किस श्रेणी में रखोगे। मेरे इतना कहने पर जोशी जी ने कहा कि यार भगवान की माया अपरम्पार है। लेकिन राहुल भाई तुम्हारी दलील एकदम जायज है। इतनी बात के बाद हम दोनों अपने अपने काम पर चल दिए।
     लेकिन, मुझे सवाल का सन्तोषजनक जबाब नहीं मिल पाया था। लिहाजा मुझे रूक रूक कर वह बात याद आ ही जाती हैं। शायद यही वजह है कि उस घटना को काफी दिन बीत जाने के बाद मैं अपने मन की व्यथा लिखने को मजबूर हूं। मैं अपने चेतनाकाल से ही कुछ मामलों में अतिवादी रहा हूं। शायद यही वजह है कि मुझे विधवा शब्द से हमेशा ही चिढ़ रही है। फिर भी, ऐसे लम्हें का चश्मदीद बनूंगा, शायद ही मैंने कभी सोचा होगा।
      मुझे मृतक दम्पत्ति की बिरादरी के एक वयक्ति ने बताया कि मीना साह मरने से पहले होश में आई थी। उस दौरान उन्होंने सबसे पहले अपने पति की तबियत के बारे में पूछा था। हालांकि उनको असलियत नहीं बताई गई थी। यह भारतीय महिला के व्यक्तित्व का एक खूबसूरत पहलू है। खुद मर रही होती है लेकिन पति की हालत पूछने की हिम्मत जुटा ही लेती है। फिर भी ये किसी बिडम्बना से कम नहीं है कि हमारे समाज में एक महिला का विधवा होना एक विधुर पुरूष के मुकाबले कहीं ज्यादा कष्टकारी है।
      लेकिन धर्म और परम्पराओं का लबादा ओढ़ने वाले ठेकेदारों ने रिश्तों ही नहीं बल्कि दुख का भी वर्गीकरण करके तथाकथित आधुनिक समाज पर भी थोप रखा है। मैं एक बात बिल्कुल साफ कर देना चाहता हूं कि मेरा मकसद मृतक दम्पत्ति के परिजनों की भावनाओं का चोट पहुंचाना नहीं है। साथ ही मुझे नहीं मालूम कि मीना साह को उनके परिजनों ने क्या मानकर विदा किया। मेरा मानना है कि पति और पत्नी में अटूट प्यार था। तभी दोनों जीवन की अन्तिम यात्रा में एक साथ विदा हुए।
      यह मेरा वयक्तिगत विचार है। इससे हर आदमी और खासतौर पर कर्मकाण्डी लोग सहमत हों जरूरी नहीं है। मैं पूर्ण रूप से नास्तिक तो नहीं लेकिन बहुत ज्यादा आस्तिक भी कभी नहीं रहा हूं। भगवान ने साह दम्पत्ति को एक साथ सड़क दुघZटना का शिकार बनाकर साथ ही साथ दोनों को वापस बुला लिया। बस दोनों की सांसे निकलने में बहुत कम अन्तर था। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या पति पत्नी की सांसे निकलने के बीच का अन्तर विधवा जैसे दकियानूसी शब्द को त्यागने का मौका नहीं देता है।
                                                        
                                         राहुल सिंह शेखावत
    
    

Wednesday, January 19, 2011

और कितना बेचारा बनेगा उत्तराखण्ड क्रान्ति दल

       देश के विभिन्न राज्यों में पिछले दो दशको के दौरान क्षेत्रीय दल भारतीय राजनीति की प्रमुख धुरी रहे हैं। लेकिन, उत्तराखण्ड इसका बहुत बड़ा अपवाद है। यहां इकलौते क्षेत्रीय उत्तराखण्ड क्रान्ति दल की हालत देखकर अस्पताल के आई सी यू में पड़े किसी एक मरीज की याद आ जाती है। सूबे की सियासत में अपना वजूद बचाने को संघर्ष करने में इस दल के संगठन और कुल जमा तीन विधायकों में एक राय नहीं है। यूकेडी ने राज्य की भाजपा सरकार से अपना समर्थन तो वापस ले लिया है। लेकिन, कैबिनेट मन्त्री दिवाकर भटट और अन्य विधायक खुले आम कह रहें हैं कि वह सरकार के साथ हैं। आलम ये है कि दल का नेतृत्व और विधायक आमने सामने आ खड़े हुए हैं। जिससे उत्तराखण्ड क्रान्ति दल में एक बार फिर विभाजन का खतरा पैदा हो गया है।
         बीते 27 दिसम्बर को दल के केिन्द्रय अध्यक्ष ति्रवेन्द्र पंवार ने कुछ पदाधिकारियों के साथ राज्यपाल को राज्य सरकार से समर्थन वापसी का पत्र सौंप दिया। उन्होंने पहले ही घोषणा कर दी थी कि यूकेडी साल 2010 के बीतने से पहले ही उत्तराखण्ड की निशंक सरकार से अलग हो जाएगी। गौरतलब है कि 2007 में  सरकार में शामिल होने के समय से ही दल के जमीनी कार्यकर्ताओं का बड़ा तबका इसके खिलाफ आवाज मुखर करता रहा है। यूकेडी के अलम्बरदारों ने कई बार ऐसा करने का दम भरा लेकिन हर बार गीदड़ भवकी से ज्यादा कुछ साबित नहीं हुआ।
         इस बार पार्टी नेतृत्व ने मजबूत इच्छाशक्ति तो दिखाई है किन्तू विधायक सरकार का साथ छोडने को तैयार ही नहीं हैं। दिवाकर भट्ट के खेमे का कहना है कि विधानमण्डल दल के नेता और विधायकों विश्वास में लिए बिना अलोकतान्ति्रक तरीके से राज्यपाल को समर्थन वापसी की चिट्ठी सौंपी गई। दल में तनातनी का आलम ये है कि पहले तो केिन्द्रय अध्यक्ष ने दिवाकर भट्ट को आजीवन पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। जिसके जबाब में काबिना मन्त्री दिवाकर के धड़े ने दल के मुखिया ति्रवेन्द्र पंवार को निलंबत करके एक समानान्तर कार्यकारी अध्यक्ष की घोषणा कर दी है।
         ये हास्यास्पद स्थिति उस उत्तराखण्ड का्रन्ति दल की है जिसकी स्थापना 25 जुलाई 1979 को मसूरी में हुई। पार्टी का उद्देश्य उत्तर प्रदेश से अलग पर्वतीय राज्य के सपने को साकार करना था। उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण के लिए यूकेडी ने अपने वजूद तक को गिरवी रखने में परहेज नहीं किया। इस दल ने राज्य नहीं तो चुनाव नहीं का नारा देकर 1994 में विधानसभा चुनावों का बहिष्कार कर दिया था। उक्रान्द ने राज्य आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 9 नबम्बर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर, उत्तराखण्ड  देश के नक्शे में एक नए राज्य के रूप में उभरा। राज्य का गठन होना जरूर यूकेडी के लिए गर्व का विषय हो सकता है, लेकिन अपने सपनों के उत्तराखण्ड की सियासत में ही इस दल को आज तक सम्मानजनक स्थान नहीं मिल पाया।
       राज्य विधान सभा के 2002 में हुए पहले आम चुनावों में यूकेडी को सिर्फ चार सीटें प्राप्त हुई। वहीं, 2007 के दूसरे विधान सभा चुनावों में उसे और एक सीट कम यानि तीन पर सन्तोष करना पड़ा। दल के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी और नारायण सिंह जन्तवाल को हार का स्वाद चखना पड़ा। संस्थापक अध्यक्ष डी डी पन्त के बाद जसवन्त सिंह विष्ट, काशी सिंह ऐरी, दिवाकर भटट, ति्रवेन्द्र पंवार, विपिन चन्द्र ति्रपाठी, बी डी रतूडी और नारायण सिंह जन्तवाल दल की बागडोर सम्भाल चुके हैं। यानि उक्रान्द के तरकश के लगभग सभी तीर आजमाये जा चुके हैं। लेकिन 31 साल की उम्र पूरी करने के बाद भी यह क्षेत्रीय दल अपने पैरों पर खड़े होने की स्थिति में नही है।
       उत्तर प्रदेश के जमाने में जसवन्त सिंह विष्ट रानीखेत से चुनाव जीतकर दल के पहले विधायक बने। उनके बाद काशी सिंह ऐरी तीन बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे। ऐरी ने उत्तराखण्ड के पहले विधानसभा चुनावों में भी जीत हासिल की। उत्तप्रदेश के जमाने में तो उसके पहाड़ी क्षेत्र में यूकेडी की अहमियत समझी जाती थी। लेकिन, उत्तराखण्ड में तो इस दल की प्रासंगिकता पर रही सवाल उठने लगे हैं। गौरतलब है कि राज्य बनने के बाद, सत्ता लगातार भाजपा और कांग्रेस के हाथों में रही हैं। इन परिस्थितियों के मददेनज़र यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि राज्य के इकलौते क्षेत्रीय दल की इतनी दयनीय हालत क्यों हैर्षोर्षो
       उत्तराखण्ड क्रान्ति दल 2007 ने विधान सभा चुनावों के बाद भाजपा नेतृत्व वाली सरकार को न सिर्फ समर्थन दिया, बल्कि उसमें शामिल हो गया। इस आत्मघाती कदम से दल की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। ऐसा करने वाले में बाहरी नहीं, बल्कि दल के लोगों की तादाद ज्यादा है। जमीनी कार्यकर्ताओं ने शुरू से ही राज्य सरकार से समर्थन वापस लेने की मांग शुरू कर दी थी। लेकिन फील्डमार्शल के उपनाम से मशहूर दिवाकर भट्ट का धड़ा हमेशा उसके बीच में दीवार बना रहा।
       गौरतलब हैै कि दिवाकर राज्य में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में काबिना मन्त्री हैं सो दल में उनकी तूती बोलना स्वाभाविक ही है। 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान यूकेडी में बड़ा अजीबोगरीब माहौल देखने को मिला। दल ने राज्य सरकार में रहते हुए उत्तराखण्ड की पांचों लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा। पार्टी के शूरमाओं ने उसे फ्रेन्डली फाईट का नाम दिया। काशी सिंह ऐरी और बी डी रतूड़ी ने अपने कार्यकर्ताओं को बेबकूफ बनाने के लिए राज्य सरकार में मिले अपने अपने दायित्वों से इस्तीफा दिया। फिर लोकसभा चुनावों के बीत जाने के बात बेशर्मी के साथ फिर पदभर सम्भाल लिया। लेकिन यह उम्मीद भी नहीं थी कि 2012 के भावी विधानसभा चुनावों के कमोबेश एक साल पहले दिवाकर भट्ट समर्थन वापसी के मुददे पर  आस्तीन चढ़ाकर पार्टी संगठन के सामने ताल ही ठोंक देंगे।
      हालांकि दिवाकर भटट लंबे समय तक चले राज्य आन्दोलन से तपकर निकले हैं। उन्होंने सड़कों पर अपने दल को ला खड़ा करने में बड़ा योगदान दिया है। फिर भी उनका अतिवादी होना किसी से छिपा नहीं है। अतीत में ऐसे मौके आए हैं जब भटट पार्टी लाईन खिलाफ जाते दिखाई दिए। श्रीयन्त टापू में धरना देना उसका उदाहरण है। अन्य कारणों के अलावा, अतिवादी रवैया 1995 में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल में विभाजन का एक कारण बना। आज एक बार फिर उत्तराखण्ड क्रान्ति दल में ठीक वैसी ही परिस्थितियां बनती नज़र आ रही हैं।
        वैसे और भी कई ऐसे निर्णय हैं जिन्होंने उक्रान्द के ताबूत में कील ठोंकने का काम किया। मसलन 1994 में जब राज्य आन्दोलन चरम पर था, तो यूकेडी राष्ट्रीय दलों की कुटिल चालों का शिकार हो गया। तत्कालीन नेतृत्व इतना अदूरदशीZ था कि उसने अपने झण्डे को साईड में रखकर राज्य आन्दोलन की अगुवाई करना मंजूर कर लिया। कांग्रेस और भाजपा को इल्म था कि यूकेडी के नेतृत्व में आन्दोलन में शरीक होने से उनके हिस्से में ज्यादा कुछ नहीं आने वाला। लिहाजा, संयुक्त संघर्ष समिति की अगुवाई में राज्य आन्दोलन हुआ। बेचारा उक्रान्द यह कह पाने का साहस नहीं जुटा पाया कि हमारी नींव ही उत्तराखण्ड राज्य के लिए पड़ी है। अगर आप राज्य बनाने को लेकर गम्भीर हैं तो हमारे पीछे खड़े हो जाईए। नतीजतन राज्य गठन के बाद से लगातार भाजपा और कांग्रेस बारी बारी से सत्ता सुख भोग रही हैं। लेकिन यूकेडी के पास बेचारा बनके उनका मुंह ताकने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।
       बहरहाल, यह सब अतीत की वो गलतियां हैं जिन्होंने अपने सपनों के ही उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय दल यूकेडी को बेचारा बनाकर रख दिया। लेकिन, गजब ये है कि इस दल ने अपनी गलतियां से सबक लेना तो दूर उनको कभी गम्भीरता से लेने की जहमत नहीं उठाई। यूकेडी पिछले चार सालों से सत्ता की चाशनी तो चाट रहा है, लेकिन फण्ड और संसाधनों का आज भी अता पता नहीं है। उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखण्ड बनने के बाद यह दल लगातार अन्दरूनी सिर फुटव्वल के लिए ही ज्यादा सुर्खियों में रहा है। हालांकि पहाड़ का एक तबका आज भी दिल में यूकेडी के लिए साफ्टकार्नर रखता है। लेकिन दल अपने आपको एक विकल्प के तौर पर रखने में नाकाम रहा।
        उत्तराखण्ड के इस इकलौते क्षेत्रीय दल की दिक्कत यह है कि आज उसके पास सर्वमान्य और सार्वभौमिक पहचान रखने वाला नेतृत्वकर्ता नहीं है। शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी में कहीं वह क्षमता है। लेकिन पहले वह पिछला विधानसभा चुनाव हारे और फिर शह  मात के खेल में काबिना मन्त्री दिवाकर भट्ट के आगे कमजोर साबित हुए। कमोबेश एक साल बाद 2012 में उत्राखण्ड में विधानसभा चुनाव होने हैं। लेकिन उसकी तैयारियों में जुट जाने की बजाय यूकेडी विभाजन की दहलीज पर खड़ा है। इन हालातों में शायद ही किसी को ये मुगालता होगा कि आगामी चुनावों में यह दल सत्ता बनाने या बचाने की भूमिका में नज़र आऐगा। लेकिन यह उत्सुकता सभी को रहेगी कि सूबे की सियासत मेंउत्तराखण्ड क्रान्ति दल अपनी प्रांसगिकता साबित कर पाऐगा या फिर हमेशा के लिए बेचारा बनकर रह जाऐगा।

                                                                                                 राहुल सिंह शेखावत
                                            
                                            

Friday, September 24, 2010

पहले कभी नहीं हुई उत्तराखण्ड में ऐसी बारिश

देवभूमि उत्तराखण्ड से अब देवता ही नाराज हो गए हैं। कम से कम बारिश को देखकर तो ऐसा ही नज़र आ रहा है। लगता है आसमान से पानी नहीं बल्कि आफत बरसी है। उत्तराखण्ड राज्य में इस बरसाती सीजन के दौरान अब तक कमोबेश 200 लोग भगवान को प्यारे हो चुके हैं। हालांकि यह पर्वतीय राज्य दैवीय आपदा की द्रष्टि से तो हमेशा ही संवेदनशील रहा है। लेकिन, तबाही और आफत का ऐसा मंजर पिछली एक शताब्दी के दौरान कभी देखने को नही मिला।

यूं तो पूरे उत्तराखण्ड में जान एवं माल का जबर्दस्त नुकसान हुआ। लेकिन, गढ़वाल के मुकाबले कुमांउ मण्डल में बारिश ने अधिक तबाही मचाई। इस क्षेत्र में 18 और 19 सितम्बर को हुई बारिश में चार दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। जिन्हें मिलाकर कुमांउ मण्डल में ही अब तक 107 लोगों की मौत हो चुकी है। अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों के कई स्थानों पर बादल फटने के कई घटनाएं हुई। जिसकी वजह से दर्जनों लोग या तो जमीन्दोज हो गए, या फिर पानी के तेज बेग में बह गए।

कहने की जरूरत नहीं है कि उत्तराखण्ड में बारिश इस कदर हुई कि आम जनजीवन ठहर नहीं, बल्कि सिहर उठा है। कुमांउ और गढ़वाल का आपस में सम्पर्क कट गया है। राज्य के मैदानी इलाकों में सड़कों के उपर पानी बह रहा है। वहीं पर्वतीय इलाकों के अधिकांश मार्गो पर भूस्खलन के चलते मलबा आ गया। राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में तो शायद ही कोई ऐसा सामान्य अथवा राजमार्ग होगा जिस पर यातायात सुचारू हो।

अगर कुमांउ मण्डल की बात करें तो नैनीताल हल्दवानी और भवाली अल्मोड़ा राजमार्ग सैकडो मीटर तक धंस गया है। वहीं, गढ़वाल में बदरीनाथ राजमार्ग पर तो इस बार तीर्थ याति्रयों की शामत ही गई। जहां तहां भूस्खखलन के चलते राजमार्ग पर लगातार मलबा आ रहा है। जिसकी वजह से सैकड़ों की संख्या में तीर्थ यात्री बीच रास्ते में दो तीन दिनों तक फंसे रहे। इतना ही नहीं, उन्हें भूखे प्यासे तक समय गुजारना पड़ा। जिससे आदर्श पर्यटन प्रदेश का दम भरने वाले उत्तराखण्ड की खासी फजीहत हो रही है।

पर्वतीय क्षेत्रों से इतर तराई और मैदान के तमाम इलाके पानी से डूबे हैं। उधमसिंह नगर जिले में भारी बाढ़ के चलते हजारों लोग प्रभावित हैं। बाढ़ प्रभावित लोग राहत शिविर या फिर अन्य सुरक्षित स्थान तलाशने की जददोजहद कर रहे हैं। देहरादून और हरिद्वार के बीच दो तीन दिनों तक रेल आवागमन पूरी तरह से ठप्प रहा। ये सूरतेहाल तो उत्तराखण्ड की मुख्यधारा में शुमार जिलों का है। दूरस्थ पहाडी क्षेत्रों में तो हातात बद से बदतर हैं क्योंकि उनका निचले इलाकों से सड़क सम्पर्क कटा हुआ है। नतीजतन, इन क्षेत्रों में खादय सामाग्राी का संकट पैदा हो गया है।

उधर, टिहरी परियोजना प्रशासन ने उत्तराखण्ड के िऋषिकेश एवं हरिद्वार को ही नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को खतरे के मुहाने पर ला खड़ा किया है। दरअसल, चारों टरवाईन चलाकर अधिक बिजली उत्पादन करने की जुगत में टिहरी की झील में निर्धारित मानकों से कहीं उपर पानी बढ़ने दिया गया। बची खुची कसर मानसून ने जाते जाते पूरी कर दी। टिहरी विदयुत परियोजना प्रशासन ने अपनी इस करतूत को छिपाया। उत्तराखण्ड सरकार भी इसका पता लगाने में असफल रही। जिससे निचले क्षेत्रों की लाखों की आबादी की सांसे टंगी हुई हैं।

समूचे उत्तराखण्ड में बीती 18 अगस्त को बारिश के रूप में आफत बरस रही थी। लेकिन, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी सरकार अपने मन्ति्रमण्डल का विस्तार करने में मस्त थी। एक लोकतान्ति्रक व्यवस्था में क्या यह संवेदनहीनता की इन्तेहा नहीं है़र्षोर्षो क्या अच्छा नहीं होता कि उस मन्ति्रमण्डल विस्तार कार्यक्रम को कुछ दिनों को टाल दिया जाता। वहीं, राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी के कांग्रेस के अघिकांश नेता दिल्ली दरबार में प्रदेश अध्यक्ष की ताजपोशी के खातिर लाबिंग में लगे रहे।

हालांकि यह सच है कि जब कुदरत अपने पर आती तो किसी की नही चलती। लेकिन उसके कहर से बचने के लिए जूझने का जज्बा तो दिखाना ही पड़ता है। हालिया बारिश के दौरान राज्य की लचर प्रशासनिक व्यवस्थाओं की एक बार फिर पोल खुली है। खासतौर पर आपदा प्रबंधन महकमों के बड़े बडे़ दावों की। अतीत मे जब कभी भी बड़ी दैवीय आपदा आई तो राहत कार्यो के लिए आई टी बी पी या फिर सेना को हमेशा बुलाना पड़ा। राज्य का प्रशासन शायद ही कभी अपने दम पर उससे निपटने में सफल रहा होगा।

इसे बिडम्बना नहीं तो और क्या कहें जब कभी भी राज्य में विपदा की स्थिति होती है, तो पक्ष विपक्ष एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिशें करने में जुट जाते हैं। अच्छा होगा कि व्यवस्था के लिए जिम्मेदार लोग वर्तमान दैवीय आपदा के मददेनज़र उससे होने वाली जान माल की हानि को कम करने को पुख्ता इन्तजाम करने की पहल करें। अपने सपनों के उत्तराखण्ड में कम से कम इतना हक तो एक आम आदमी का बनता ही है।



राहुल सिंह शेखावत

Monday, September 13, 2010

गिरदा के बिना उत्तराखण्ड में सन्नाटा नज़र आता है

उत्तराखण्ड के मशहूर जनकवि गिरीश तिवारी गिरदा ने दुनिया को अलविदा कह दिया है। लंबे समय से अल्सर की बीमारी से जूझ रहे गिरदा ने बीते 22 अगस्त को नैनीताल जिले के हल्दवानी शहर के एक अस्पताल में दम तोड दिया। उनकी मौत के साथ ही उत्तराखण्ड की अन्तर्रात्मा की आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। वह एक जनकवि होने के साथ साथ जनवादी आन्दोलनकारी, रंगकमी, लेखक एवं एक बेहतरीन निर्देशक भी थे। लेकिन इन सबसे हटकर गिरदा अभिव्यक्ति के बेताज बादशाह थे। साथ ही, उनका पहाड की लोक संस्कृति में असाधारण दखल था। गिरदा नामक एक इंसान अपने भीतर इन तमाम खूबियों को समेटे हुए था। यही वजह है कि उनकी मौत के बाद उत्तराखण्ड में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है जिसकी भरपाई असम्भव है!

बहुआयामी शिख्शयत गिरीश तिवाडी अपने चहेतों के बीच गिरदा के उपनाम से मशहूर थे। गिरीश तिवाडी से गिरदा बन जाने के बीच लंबा संघर्ष और त्याग की कहानी छिपी है। वह अल्मोडा के हबालबाग विकास खण्ड के ज्यौली गांव के एक उच्चकुलीन परिवार में साल 1945 में पैदा हुए। गिरदा ने शुरूआती दौर में आजीविका के लिए लखनउ में क्लकीZ की नौकरी की। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि उन्होंने रिक्शा खींचकर भी अपने दिन गुजारे। शायद यहीं से उनके अन्दर जनवाद के बीच पड गये। गिरदा ने 1967 में भारत सरकार के गीत एवं नाटय प्रभाग में बतौर अनुदेशक नौकरी शुरू की। सही मायनों में यहीे से उनके बहुआयामी जीवन का सिलसिला शुरू हुआ।

उत्राखण्ड में रंगमंच को आधुनिक रूप देने का श्रेय गिरदा को जाता है। उन्होंने लेनिन पन्त, मोहन उपे्रती और प्रोफेसर शेखर पाठक सरीखे लोगों के साथ मिलकर नैनीताल में युगमंच नामक संस्था की बुनियाद रखी। गिरदा के निर्देशन में 1976 में अंधायुग नामक नाटक का मंचन किया गया। गिरदा ने नाटकों में पहाडी लोक तत्वों का अदभुत समावेश किया। उन्होंने बाद में थैक्यू मिस्टर ग्लाड और अंधेरनगरी सरीखे नाटकों के जरिए तत्कालीन केन्द्र सरकार दवारा थोपे गए आपातकाल का प्रतिरोध किया गया। उसके बाद भी कई मौके आए जब सरकारी नौकरी में रहते हुए गिरदा ने जनसरोकारों के खातिर सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द की। उन्होंने हमेशा कविताओं और जनगीतों को ही अपने प्रतिरोध का हथियार बनाया।

यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा कि गिरदा और आन्दोलन दोनों एक दूसरे के हमेशा पर्याय बने रहेे। 70 के दशक में राज्य में चले वन आन्दोलन के दौरान गिरदा एक नए अवतार में लोगों के सामने आए। उन्होंने हुडका बजाते हुए सडको पर उतरकर आन्दोलन में शिरकत की थी। गिरदा के उस आन्दोलनकारी कदम ने समाज में एक नई बहस छेड दी। गौरतलब है कि उस दौर में हुडका कथित तौर पर छोटी जाति वाले लोग ही बजाते थे। एक उच्च कुलीन ब्राहमण होने के बाबजूद उन्होंने हुडका पकडकर समाज की जातिवादी व्यवस्था को चुनौती देने का बडा काम किया। धर्म और समाज के ठेकेदारों को गिरदा का वह अन्दाज पंसद नहीं आया। लेकिन गिरदा की उस बगाबत के पीछे उनकी जनवादी सोच छिपी हुई थी।

1994 के उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान गिरदा ने अपने जनगीतों और कविताओं के माध्यम से पहाडी जनमानस को उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण के लिए बडे प्रभावशाली ढंग से आन्दोलित करने का काम किया। उन्होंने अपने जनगीतों और अदभुत अभिव्यक्ति के माध्यम से लोगों के अन्दर इंकलाब पैदा किया। राज्य आन्दोलन के दौरान गिरदा का उत्तराखण्ड बुलेटिन खासा सुर्खियों में रहा। वह आन्दोलन से जुडी हर रोज की घटना को अपनी कविता के माध्यम से लोगों को सुनाते थे। जब भी कहीं राज्य आन्दोलन या फिर आन्दोलनकारियों के दमन की खबरें आती थी उन्हें और एक नई कविता लिखने और सुनाने का मौका मिला जाता था।

गिरदा ने लोगों को भावी उत्तराखण्ड की तस्वीर भी लोगों को आन्दोलन के वक्त ही दिखा दी थी। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड आगामी 9 नबम्बर को दस साल की उम्र पूरी करने जा रहा है। इस अल्पायु में ही राज्य में लोग अक्सर यह कहते हुए सुनाई पड जाते हैं कि राज्य के वर्तमान हालातों से तो पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश का जमाना भी बहुत ज्यादा बुरा नहीं था। मजेदार बात ये है कि गिरदा ने इस तस्वीर या फिर कहें कि आशंका को राज्य आन्दोलन के दौरान ही लोगों के सामने ला दिया था। जिसकी बानगी उनकी कविता कस होली विकास नीति कस हमारा नेता में दिखाई देती है।

गिरदा ने अपने जीवन के दौरान उत्तराखण्ड की आंचलिक प्रतिद्वन्दता घटाने का सराहनीय कार्य किया। वह अपने व्यक्तित्व और आित्मक व्यवहार के चलते कुमांउ और गढवाल के सेतू के रूप में देखे गए। उनकी स्वीकार्यता राज्य के दोनों मण्डलों में बराबर थी, चाहे वह कुमांउ हो या फिर गढवाल। गिरदा और लोक गायक नरेंन्द्र सिंह नेगी की जुगलबन्दी लोगों को खूब पसन्द आई थी। इन सब बातों के अलावा गिरदा में खासियत थी कि वह बेहद गम्भीर मसले को बडी सहजता के साथ अपनी कविताओं के माध्यम से कहने का दम रखते थे। उन्होंने राज्य बनने के बाद अपनी बेखौफ अभिव्यक्ति जारी रखी।

गिरदा के मन मस्तिष्क में पहाड इस कदर हावी था कि बीमार होने के बाबजूद वह मसूरी, खटीमा और मुजफफरनगर काण्डों की बरसी पर धरने पर बैठने से नहीं चूकते थे। कहना न होगा कि गिरदा एक जनकवि या फिर महज एक आन्दोलनकारी भर नहीं थे। दरअसल, वह उत्तराखण्ड की अन्तर्रात्मा की आवाज के सच्चे वाहक थे।

एक पत्रकार के तौर मुझे उनके व्यक्तित्व के कई आयामों को देखने का मौका मिला। मै उन्हें याद करके अपने आप से एक ही सवाल पूछता हूं कि बिना गिरदा के उत्तराखण्ड का क्या मतलब है। क्या अच्चा नहीं होता कि गिरदा राज्य गठन के एक दशक पूरा होने पर अपनी एक कविता के साथ प्रतिक्रिया देने के लिए मौजूद रहते। उत्तराखण्ड के हालातों पर एक बेबाक, सटीक और गम्भीर टिप्पणी करने का दम सिर्फ और सिर्फ गिरदा ही रखते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने उत्तराखण्ड की लडाई की अगुवाई तो की, लेकिन राज्य बन जाने के बाद कभी अपने नीजि स्वार्थ का ख्वाब नहीं देखा।

राहुल सिंह शेखावत

टेलीविजन पत्रकार